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कर्क राशि (Cancer) के जातक चंद्रमा से प्रभावित जल तत्व के होते हैं। शीतलता, शालीनता, भावुक होना, संवेदना इनके स्वभाव में होता है। ये सामान्य कद-काठी के और दिखने में आकर्षक होते हैं। ये काफी मिलनसार प्रवृति के होते हैं। कर्क राशि में जन्में लोग कला के क्षेत्र में लगाव रखते हैं। कर्क राशि के जातकों गहरे विचार वाले होते हैं। ये लोग अपनी छवि हमेशा साफ रखते हैं। इनके स्वभाव में कोमलता और चंचलता के साथ ही भावनाएं कूट-कूट कर भरी होती है। इस राशि के जातकों के लिए पीला और सफेद रंग शुभ माना जाता है। आइए जानें तारामंडल और राशि चक्र में कर्क राशि (Kark Rashi) का स्थान और इनके नक्षत्रों की स्थिति क्या है।
मनुष्य के जन्म से उनकी राशि निश्चित हो जाती है और यह मरणोपरांत तक उनके साथ हमेशा रहती है। राशि की दुनिया में अलग-अलग नक्षत्र, संज्ञक आदि होते हें जो जातक को उम्रभर शुभ अशुभ फल देते हैं।
कर्क राशि (Cancer) को राशि चक्र में और तारामंडल में चौथा सथान दिया गया है। यह उत्तर दिशा में वास करने वाली पृष्ठोदयी राशि है। इस राशि का प्रारंभ 91 डिग्री ये लेकर 120 डिग्री कं अंदर होता है। कर्क राशि का आकार केंकड़े की भांति माना गया है। यह चर राशि है, संज्ञक और सौम्य प्रकृति, और जल तत्व मानी गई है। कर्क राशि का स्वामी चंद्रमा और इसका वर्ण रक्त श्वेत है। कर्क राशि का स्थान कालपुरुष के शरीर में हृदय प्रदेश कहा गया है। इस राशि का निवास स्थान बावड़ी, पोखर, ताल, जल से सटे सभी स्थान माने गए हैं। कर्क राशि स्त्रीलिंग सम और सौम्य राशि है। जिसकी गहन जानकारी online kundali in hindi के माध्यम से भी प्राप्त की जा सकती है।
कर्क राशि (Cancer) के भी सभी राशिकों के जैसे ही दो होरा हैं। पहली होरा 15 अंश की और दूसरी होरा 15 अंश की है जो कि कुल मिलाकर 30 अंश की होती है। पहली होरा का स्वामी चंद्रमा और दूसरी होरा का स्वामी सूर्य है। द्रैष्काण भी तीन कहे गए हैं। एक द्रैष्काण दस डिग्री का है और इस प्रकार तीन द्रैष्काण कुल मिलाकर 30 डिग्री की पूरी राशि बनाते हैं। इस राशि के प्रथम द्रैष्काण में का स्वामी चंद्र और दूसरे का मंगल और तीसरे का बृहस्पति स्वामी है। इन सूक्ष्म विभाजनों का प्रयोग प्रायः ज्योतिष परामर्श में किया जाता है।
कर्क राशि के 7 सप्तमांश होते हैं। पहला सप्तमांश का स्वामी शनि, दूसरे का भी शनि, तीसरे का बृहस्पति, चौथे का मंगल, पांचवे का शुक्र, छठे का बुध, सातवें का स्वामी चंद्र कहा गया है।
Kark Rashi के 9 नवमांश होते हैं। एक नवमांश 3 अंश और 20 विकला का होता है। कर्क राशि के पहले नवमांश का स्वामी चंद्र, दूसरे का सूर्य, तीसरे का बुध, चौथे का शुक्र, पांचवे का मंगल, छठे का बृहस्पति, सातवें का शनि, आठवें का भी शनि, नौवें का बृहस्पति कहा गया है।
कर्क राशि (Cancer) के 10 दशमांश हैं। प्रत्येक दशमांश के 3 अंश होते हैं। पहले दशमांश का स्वामी बृहस्पति, दूसरे दशमांश का स्वामी मंगल, तीसरे का शुक्र, चौथे का बुध, पांचवे का चंद्र, छठे का सूर्य, सातवें का बुध, आइवें का शुक्र, नौवें का मंगल, दसवें का स्वामी बृहस्पति कहा गया है। जो astrology in Hindi में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
कर्क राशि के 12 द्वादशांश हैं जिसमें प्रत्येक द्वादशांश 2 अंश और 30 कला का माना गया है। पहले द्वादशांश का स्वामी चंद्र, दूसरे का सूर्य, तीसरे का बुध, चौथे का शुक्र, पांचवे का मंगल, छठे का बृहस्पति, सातवें का शनि, आठवें का शनि, नौवें का बृहस्पति और दसवें का स्वामी मंगल है। ग्यारहवें का स्वामी शुक्र और बारहवें का स्वामी बुध होता है।
अब आते हैं कर्क राशि (Kark Rashi) के षोडशांश की तरफ। कर्क राशि के 16 षोडशांश हैं जिसमें एक षोडशांश 1 अंश और 52 कला और 30 विकला का है। इस राशि के पहले षोडशांश का स्वामी मंगल, दूसरे का शुक्र, तीसरे का बुध, चौथे का चंद्र, पांचवे का सूर्य, छठे का बुध, सातवें का शुक्र, आठवें का मंगल, नौवें बृहस्पति, दसवें का स्वामी शनि, ग्यारहवें का स्वामी शनि, बारहवें का बृहस्पति, तेरहवें का मंगल, चौदहवें का शुक्र, पंद्रहवें का बुध और सोलहवें का चंद्र स्वामी होता है।
कर्क राशि के 5 त्रिशांश होते हैं, पहला त्रिशांश 5 अंश का और इसका स्वामी शुक्र है। दूसरा 7 अंश का और स्वामी बुध, तीसरा त्रिशांश 8 अंश का और स्वामी बृहस्पति है, चौथा त्रिशांश 5 अंश का और उसका स्वामी शनि है, पांचवा त्रिशांश 5 अंश का है और उसके स्वामी मंगल हैं। इन सूक्ष्म गणनाओं के आधार पर जातकों को उपयुक्त रत्न धारण करने की सलाह दी जाती है।
इसी क्रम में कर्क राशि के 60 षष्ट्यंस होते हैं। एक षष्ट्यंस 30 कला अर्थात आधा अंश का होता है। इनके स्वामी कुछ इस तरह हैं। पहला इन्दुरेखा, दूसरा भ्रमण, तीसरा सुधासयो, चौथा अतिशित, पांचवा अशुभ, छठा शुभ, सातवां निर्मल, 8वां दंडायुत, 9वां कालाग्नि, 10वां प्रवीण, 11वां इन्दुमुख, 12वां दृष्टकराल, 13वां सुशीतल, 14वां मृदु, 15वां सौम्य, 16वां कालरूप, 17वां उत्पात, 18वां वन्शछय, 19वां मुख्या, 20वां कुलनाश, 21वां विश्दाग्ध, 22वां पूर्णचंद्र, 23वां अमृत, 24वां सुधा, 25वां कंटक, 26वां अधम, 27वां घोर, 28वां दावाग्नि, 29वां काल, 30वां मृत्यु, 31वां मन्दात्मज, 32वां मलकर, 33वां क्षितिज, 34वां कलिनाश, 35वां आर्द्र, 36वां देव, 37वां दिगंबर, 38वां वागीश, 39वां विष्णु, 40वां पद, 41वां कोमल, 42वां मिर्दु, 43वां चंद्र, 44वां अमृत, 45वां सर्प, 46वां कला, 47वां इंद्र, 48वां वरुण, 49वां यम, 50वां माया, 51वां अग्नि, 52वां गरल, 53वां कुलघ्न, 54वां भ्रष्ट, 55वां किन्नर, 56वां यक्ष, 57वां कुबेर, 58वां देव, 59वां राक्षस, 60वां घोर माना गया है। नाम के मुताबिक ये सभी षष्ट्यंस कर्क राशि के जातकों को शुभ अशुभ फल प्रदान करते हैं।
कर्क राशि (Kark Rashi) में सत्ताइस नक्षत्रों के 108 चरणों में कुल नौ चरण पुनर्वसु से आश्लेषा तक, जिसमें की पुनर्वसु नक्षत्र का अंतिम चौथा चरण वर्ण अक्षर है। पुनर्वसु 4 ही, पुष्य 1 हू, 2 हे, 3 हो, 4 डा, आश्लेषा 1 डी, 2 डू, 3 डे, 4 डो, ये नौ चरण कर्क राशि के हैं और सभी चरण 3।20 डिग्री का है। सभी चरण के स्वामी चंद्र के साथ अलग-अलग होते हैं। मिथुन और वृषभ राशि के तरह कर्क राशि भी रात्रिबली है। रात के समय इस राशि के जातक ज्यादा शक्तिशाली होते हैं।
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