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कन्या राशि (Virgo) में जन्में लोग विवेकशील होते हैं। ये लोग अपनी मेहनत के दम पर जीवन में सफलता का स्वाद चखते हैं। कन्या राशि के जातक न्यायप्रिया होने के साथ-साथ आलोचक प्रवृति के भी होते हैं। ये लोग व्यवहार कुशल और जल्दी मित्र बनाते हैं। ईमानदार और अपने विचार को खुलकर रखने वाले कन्या राशि के मनुष्यों की खासियत है। इन्हें पढ़नें में बहुत रुचि होती है। इनके स्वभाव में मदद करना इन्हें लोगों के बीच लोकप्रिय बनाता है। उनके इस स्वभाव के कारण कार्यस्थल पर भी इन्हें अपनी सहकर्मियों का अच्छा व्यवहार मिलता है। कन्या राशि के जातकों के लिए नीला और स्लेटी रंग शुभ माना जाता है।
तारामंडल और राशि चक्र में कन्या राशि का क्या स्थान है आइए जानें।
राशियों में कन्या राशि (Kanya Rashi) का स्थान राशि चक्र और तारामंडल में छठे स्थान पर है। यह राशि दक्षिण दिशा में वास करता है और इसे शीर्षोदयी राशि माना गया है। इस राशि का प्रारंभ 151 डिग्री से लेकर 180 डिग्री के बीच होता है। कन्या राशि की आकृति नौका पर बैठी, हाथ में धान की बाली और अग्नि धारण किए स्त्री के रूप में मानी गई है। इस राशि को द्विस्वभाव संज्ञक और सौम्य प्रकृति की पृथ्वी तत्व कहा गया है। कन्या राशि का स्वामी बुध है और इसका वर्ण विविध है। कालपुरुष के शरीर में कन्या राशि का स्थान कटी यानी कमर प्रदेश कहा गया है। इसका निवास स्थान बाग बगीचे, स्त्रीशाला, स्त्री पुरुष विहार, हरियाली वाले स्थल हैं। कन्या राशि नाम के स्वरूप ही स्त्री लिंग दीर्घ और सौम्य राशि है।
कन्या राशि से जुड़े इन सभी गुणों को व्यक्ति अपनी online kundali in hindi के माध्यम से भी विस्तार से समझ सकता है।
कन्या राशि के दो होरा होती है। पहली होरा 15 अंश की और दूसरी होरा भी 15 अंश के हैं। पहली होरा के स्वामी चंद्रमा और दूसरी होरा के स्वामी सूय्र मानी गई है। द्रैष्काण तीन कहे गए हैं। प्रत्येक द्रैष्काण 10 डिग्री के होते हैं। कुल मिलाकर तीनों द्रैष्काण तीस डिग्री की पूरी राशि बनाते हैं। कन्या राशि के पहले द्रैष्काण का स्वामी बुध और दूसरे का स्वामी शनि है। तीसरे द्रैष्काण का स्वामी शुक्र माना गया है।
इन विभागों का सही फल जानने के लिए अनुभवी ज्योतिष परामर्श विशेष रूप से उपयोगी माना जाता है।
कन्या राशि (Virgo) के 7 सप्तमांश हैं। पहला सप्तमांश का स्वामी बृहस्पति, दूसरे का मंगल, तीसरे का शुक्र, चौथे का बुध, पांचवे का चंद्र, छठे का सूर्य, सातवें का स्वामी भी बुध माना गया है। जिसे astrology in Hindi में विस्तार से समझाया गया है।
इसके 9 नवमांश होते हैं, जिसमें एक नवमांश 3 अंश और 20 विकला से संपूर्ण है। पहले नवमांश का स्वामी शनि, दूसरे का भी शनि, तीसरे का बृहस्पति, चौथे का मंगल, पांचवे का शुक्र, छठे का बुध, सातवें का चंद्रमा, आठवें का सूर्य, नौवें का बुध स्वामी है। कन्या राशि के 10 दशमांश होते हैं। प्रत्येक दशमांश के 3 अंश हैं। पहले दशमांश का स्वामी शुक्र, दूसरे का बुध, तीसरे का चंद्रमा, चौथे का सूर्य, पांचवे का बुध, छठे का शुक्र, सातवें का मंगल, आठवें का बृहस्पति, नौवें का शनि और दसवें का स्वामी भी शनि ही माना गया है।
इन अंशों के अनुसार जीवन में उपयुक्त रत्न धारण करने की सलाह भी दी जाती है।
कन्या राशि के 12 द्वादशांश होते हैं। हर एक द्वादशांश 2 अंश और 30 कला के हैं। पहले द्वादशांश का स्वामी बुध, दूसरे का शुक्र, तीसरे का मगल, चौथे का बृहस्पति, पांचवे का शनि, छठे का भी शनि, सातवें का बृहस्पति, आठवें का मंगल, नौवें का शुक्र, दसवें का बुध, ग्यारहवें का चंद्रमा और बारहवें का स्वामी सूर्य होता है। कन्या राशि के 16 षोडशांश हैं। एक षोडशांश 1 अंश, 52 कला और 30 विकला के हैं। पहले षोडशांश का स्वामी बृहस्पति, दूसरे का शनि, तीसरे का शनि, चौथे का बृहस्पति, पांचवे का मंगल, छठे का शुक्र, सातवें का बुध, आठवें का चंद्रमा, नौवें का सूर्य, दसवें का स्वामी बुध, ग्यारहवें का शुक्र, बारहवें का मंगल, तेरहवें का बृहस्पति, चौदहवें का शनि, पंद्रहवें का शनि और सोलहवें का बृहस्पति स्वामी है।
इसी तरह कन्या राशि के 5 त्रिशांश हैं। पहला त्रिशांश 5 अंश का है और इसके स्वामी शुक्र हैं। दूसरा त्रिशांश 7 अंश और स्वामी बुध, तीसरा त्रिशांश 8 अंश का और स्वामी बृहस्पति, चौथा त्रिशांश 5 अंश और स्वामी शनि तथा पांचवा त्रिशांश 5 अंश का है और इसके स्वामी मंगल हैं।
अब बारी है कन्या राशि (Virgo) के षष्ट्यंस की। कन्या राशि के 60 षष्ट्यंस हैं। एक षष्ट्यंस 30 कला यानी आधा अंश का होता है। इनके स्वामी कुछ इस प्रकार हैं। पहले षष्ट्यंस का स्वामी इन्दुरेखा, दूसरे का भ्रमण, तीसरे का सुधासयो, चौथे का अतिशित, पांचवे का अशुभ, छठे का शुभ, 7वें का निर्मल, 8वें का दंडायुत, 9वें का कालाग्नि, 10वें का प्रवीण, 11वें का इन्दुमुख, 12वें का दृष्टकाल, 13वें का सुशीतल, 14वें का मृदु, 15वें का सौम्य, 16वें का कालरूप, 17वें का उत्पात, 18वें का वन्शछय, 19वें का मुख्या, 20वें का कुलनाश, 21वें का विश्दाग्ध, 22वें का पूर्णचंद्र, 23वें का अमृत, 24वें का सुधा, 25वें का कंटक, 26वें का अधम, 27वें का घोर, 28वें का दावाग्नि, 29वें का काल, 30वें का मृत्यु, 31वें का मन्दात्मज, 32वें का मलकर, 33वें का क्षितिज, 34वें का कलिनाश, 35वें का आर्द्र, 36वें का देव, 37वें का दिगंबर, 38वें का वागीश, 39वें का विष्णु, 40वें का पद, 41वें का कोमल, 42वें का मिर्दु, 43वें का चंद्र, 44वें अमृत, 45वें का सर्प, 46वें का कला, 47वें का इंद्र, 48वें का वरुण, 49वें का यम, 50वें का माया, 51वें का अग्नि, 52वें का गरल, 53वें का कुलघ्न, 54वें का भ्रष्ट, 55वें का किन्नर, 56वें का यक्ष, 57वें का कुबेर, 58वें का देव, 59वें का राक्षस, 60वें का स्वामी घोर है। ये 60 षष्ट्यंस अपने नाम के मुताबिक कन्या राशि के जातकों को शुभ और अशुभ फल देते हैं।
कन्या राशि में सत्ताइस नक्षत्रों के 108 चरणों में कुल नौ चरण उत्तराफाल्गुनी से चित्रा तक, जिसमें उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के तीन चरण जिसके वर्ण अक्षय हैं। उत्तराफाल्गुनी 2 टो, 3 पा, 4 पी, हस्त 1 पु, 2 ष, 3 ण, 4 ठ, चित्रा 1 पे, 2 पो, ये नौ चरण कन्या राशि के हैं। प्रत्येक चरण 3।20 डिग्री का है और हर एक चरण के नक्षत्र स्वामी बुध के साथ अलग-अलग हैं।
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