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वृषभ राशि (Vrishabha Rashi) के जातक दिखने में सुंदर होते हैं। उनका शारीरिक ढांचा उन्हें बलवान प्रतीक करवाता है। वे रचनात्मक प्रतिभा के धनी होते हैं। वृषभ राशि के जातक बुद्धिमान होते हैं। उन्हें मजाक भी पसंद होता है और इस राशि के लोग अक्सर लोगों से जल्दी घुल-मिल जाते हैं। वृषभ राशि (Taurus) के लोग विश्वनीय होते हैं। वे अपने दोस्त, सहयोगी, परिवार के साथ कभी धोखधड़ी नहीं करते। इस राशि के जाते परिश्रमी और दृढ़निश्चयी होते हैं। अपनी मेहनत और योग्यता की अदौलत वृषभ राशि के लोग सुखी संपन्न जीवन व्यतीत करते हैं। इस राशि के जातकों के लिए नीला और गुलाबी रंग शुभ माना जाता है। आइए जानें तारामंडल में वृषभ राशि के स्थान और इनके नक्षत्रों के बारे में, जिसे online kundali in hindi के माध्यम से भी विस्तार से समझा जा सकता है।
वृषभ राशि (Taurus) राशि चक्र और तारामंडल के दूसरे स्थान पर स्थित पृष्ठोदयी राशि है। इसका वास स्थान पश्चिम की ओर है। तारामंडल में इस राशि का प्रारंभ 31 डिग्री से लेकर 60 डिग्री के अंतर्गत होता है। बात करें वृषभ राशि के आकार की तो वृषभ राशि को बैल के सिर की आकृति समान रखा गया है। पर्वत के शिखर, कृषिभूमि, गौशाला और जंगलों में वृषभ राशि का निवास स्थान है। इन खगोलीय तथ्यों का अध्ययन astrology in Hindi में विशेष महत्व रखता है।
स्थिर संज्ञक तथा सौम्य प्रकृति के कारण वृषभ राशि पृथ्वी तत्व माना गया है। इसका स्वामी शुक्र और वर्ण सफेद है। कालपुरुष के शरीर में वृषभ राशि (Taurus) का स्थान मुख प्रदेश कहा गया है। वृषभ राशि स्त्रीलिंग माना गया है। यह राशि 30 अंश के दो होरा में बंटी हुई है। पहली होरा 15 अंश की तथा दूसरी होरा 15 अंश की। पहली होरा का स्वामी चंद्रमा है और दूसरी होरा का स्वामी सूर्य। इस राशि के तीन द्रैष्काण हैं। एक द्रैष्काण 10 डिग्री का होता है। तो कुल मिलाकर तीनों द्रैष्काण, राशि के 30 डिग्री को पूरा करता है। पहले द्रैष्काण का स्वामी शुक्र, दूसरे द्रैष्काण का स्वामी बुध और तीसरे द्रैष्काण का स्वामी शनि है। इन सूक्ष्म विभाजनों के आधार पर अनुभवी विद्वान ज्योतिष परामर्श देते हैं।
वृषभ राशि (Vrishabh rashi) के 7 सप्तमांश होते हैं। पहला सप्तमांश का स्वामी मंगल, दूसरे का बृहस्पति, तीसरे और चौथे का शनि, पांचवे का बृहस्पति, छठे का मंगल और सातवें का स्वामी शुक्र माना गया है।
Vrishabha Rashi के 9 नवमांश होते हैं। एक नवमांश 3 अंश का और 20 विकला का होता है। वृषभ राशि के पहले और दूसरे नवमांश का स्वामी शनि, तीसरे का बृहस्पति, चौथे का मंगल, पांचवे का शुक्र, छठे का बुध, सातवें चंद्रमा, आठवें का सूर्य, नौवें का बुध कहा गया है। नवमांश के जैसे ही वृषभ राशि के 10 दशमांश हैं। हर एक दशमांश 3 अंश का है। पहले दशमांश का स्वामी शनि, दूसरे दशमांश का भी शनि, तीसरे का बृहस्पति, चौथे का मंगल, पांचपे का शुक्र, छठे का बुध, सातवें का चंद्रमा, आठवें का सूर्या, नौवें का बुध और दसवें का स्वामी शुक्र है।
इसी क्रम में वृषभ राशि के 12 द्वादशांश हैं। प्रत्येक द्वादशांश 2 अंश और 30 कला का कहा गया है। पहले द्वादशांश का स्वामी शुक्र, दूसरे का बुध, तीसरे का चंद्रमा, चौथे का सूर्य, पांचवे का बुध, छठे का शुक्र, सातवें का मंगल, आठवें का बृहस्पति, नौवें का शनि, दसवें का स्वामी शनि, ग्यारहवें का बृहस्पति, बारहवें का स्वामी मंगल है। इन अंशों के अनुसार शुभ रत्न धारण करने की सलाह भी दी जाती है।
अब आते हैं वृषभ राशि (Taurus) के षोडशांश पर। वृषभ राशि के 16 षोडशांश होते हैं। प्रत्येक षोडशांश 1 अंश और 52 कला और 30 विकला के हैं। पहले षोडशांश का स्वामी सूर्य, दूसरे का बुध, तीसरे का शुक्र, चौथे का मंगल, पांचवे का बृहस्पति, छठे का शनि, सातवें का भी शनि, आठवें का बृहस्पति, नौवें का मंगल, दसवें का शुक्र, ग्यारहवें का बुध, बारहवें का स्वामी चंद्र, तेरहवें का सूर्य, चौदहवें का बुध, पंद्रहवें का शुक्र और सोलहवें का स्वामी मंगल होता है।
वृषभ राशि के पांच त्रिशांश हैं। पहला त्रिशांश पांच अंश का माना गया है। पहला त्रिशांश का स्वामी शुक्र है। दूसरा त्रिशांश 7 अंश का है और इसका स्वामी बुध है। तीसरा त्रिशांश 8 अंश का है और इसका स्वामी बृहस्पति है। चौथा त्रिशांश 5 अंश का और इसका स्वामी शनि है। पांचवा त्रिशांश 5 अंश और इसका स्वामी मंगल है।
वृषभ राशि (Vrishabha Rashi) के षष्टयंस 60 होते हैं। एक षष्टयंस 30 कला अर्थात आधा अंश का है। इनके स्वामी 60 हैं और वे कुछ इस तरह हैं। पहले षष्टयंस का स्वामी इंदुरेखा, दूसरे षष्टयंस का स्वामी भ्रमण, तीसरे षष्टयंस का स्वामी सुधासयो, चौथे का अतिशित, 5वें का स्वामी अशुभ, छठे का शुभ, 7वें का निर्मल, 8वें का दंडायुत, 9वें का कालाग्नि, 10वें का प्रवीण, 11वें का इंदुमुख, 12वें का दृष्टकाल, 13वें का सुशीतल, 14वें का मृदु, 15वें का सौम्य, 16वें का कालरूप, 17वें का उत्पात, 18वें का वन्शछय, 19वें का मुख्या, 20वें का कुलनाश, 21वें का विश्दाग्ध, 22वें का पूर्णचंद्र, 23वें का अमृत, 24वें का सुधा, 25वें का कंटक, 26वें का अधम, 27वें का घोर, 28वें का दावाग्नि, 29वें का काल, 30वें का मृत्यु, 31वें का मन्दात्मज, 32वें का मलकर, 33वें का क्षितीज, 34वें का कलिनाश, 35वें का आर्द्र, 36वें का देव, 37वें का दिगंबर, 38वें का वागीश, 39वें का विष्णु, 0वें का पद, 41वें का कोमल, 42वें का मिर्दु, 43वें का चंद्र, 44वें का अमृत, 45वें का सर्प, 46वें का कला, 47वें का इंद्र, 48वें का वरुण, 49वें का यम, 50वें का माया, 51वें अग्नि, 52वें का गरल, 53वें का कुलघ्न, 54वें का भ्रष्ट, 55वें का किन्नर, 56वें का यक्ष, 57वें का कुबेर, 58वें का देव, 59वें का राक्षस, 60वें का घोर स्वामी है। कुल मिलाकर ये 60 षष्टयंस अपने नाम के अनुसार वृषभ राशि के जातकों को शुभ और अशुभ फल देते हैं।
इस राशि में सत्ताइस नक्षत्रों के 108 चरणों में कुल नौ चरण कृतिका से मृगराशि तक जिसमें की कृतिका नक्षत्र के तीन चरण जिसके वर्ण अक्षर हैं। कृतिका 2 इ, 3 उ, 4 ए, रोहिणी 1 ओ, 2 वा, 3 वी, 4 वू, मृगशिरा 1 वे, 2 वो होते हैं। ये नौ चरण वृषभ राशि के हैं और प्रत्येक चरण 3।20 डिग्री का है। हर एक चरण का नक्षत्र स्वामी शुक्र के साथ अलग-अलग होता है। वृषभ राशि रात्रि के समय सबसे ताकतवर होती है। अत: इसे रात्रिबलि राशि भी कहा जाता है।
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