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अजा एकादशी 2026 भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाएगी। साल 2026 में अजा एकादशी व्रत 7 सितंबर 2026, सोमवार को रखा जाएगा। वैष्णव और सनातन परंपरा में यह एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि अजा एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति, मानसिक शांति और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन प्राप्त होते हैं।
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विवरण |
समय |
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अजा एकादशी 2026 व्रत |
7 सितंबर 2026, सोमवार |
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एकादशी तिथि प्रारंभ |
6 सितंबर 2026 रात 09:59 बजे |
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एकादशी तिथि समाप्त |
7 सितंबर 2026 शाम 07:33 बजे |
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पारण समय |
8 सितंबर 2026 सुबह 07:06 से 09:32 बजे तक |
अजा एकादशी भगवान विष्णु की उपासना को समर्पित महत्वपूर्ण एकादशी मानी जाती है। यह व्रत भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में रखा जाता है। धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा और उपवास करने से व्यक्ति के जीवन के कष्ट कम होते हैं और मन को शांति मिलती है।
अजा एकादशी का संबंध सत्य, संयम और भक्ति से माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ तुलसी पूजा का भी विशेष महत्व होता है।
हिंदू धर्म में अजा एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा से करने पर व्यक्ति को:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, अजा एकादशी व्रत राजा हरिश्चंद्र से भी जुड़ा हुआ माना जाता है। कहा जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से उन्हें अपने जीवन के कठिन समय से मुक्ति मिली थी।
अजा एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
भगवान विष्णु को:
अर्पित करना शुभ माना जाता है।
पूजा के समय इस मंत्र का जाप किया जाता है:
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
इसके अलावा विष्णु सहस्रनाम और गीता पाठ भी शुभ माना जाता है।
अजा एकादशी व्रत में कई लोग निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ भक्त फलाहार करते हैं। व्रत के दौरान सात्विक भोजन और भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करना महत्वपूर्ण माना गया है।
इस दिन चावल और अनाज खाने से बचा जाता है। अगले दिन द्वादशी तिथि में पारण करके व्रत पूरा किया जाता है।
अजा एकादशी व्रत को आध्यात्मिक और मानसिक रूप से लाभकारी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत से:
जो लोग नियमित रूप से एकादशी व्रत रखते हैं, उनके जीवन में अनुशासन और संयम बढ़ने की भी मान्यता है।
राजा हरिश्चंद्र को सत्य और धर्म का पालन करने वाले महान राजाओं में गिना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय ऋषि विश्वामित्र ने उनकी सत्यनिष्ठा की परीक्षा लेने का निश्चय किया। कहा जाता है कि राजा हरिश्चंद्र ने स्वप्न में अपना पूरा राज्य ऋषि विश्वामित्र को दान कर दिया था। अगले दिन जब ऋषि विश्वामित्र ने उनसे दान की दक्षिणा मांगी, तब राजा के पास देने के लिए कुछ भी शेष नहीं था, क्योंकि वे अपना राजपाट और राजकोष पहले ही दान कर चुके थे।
धर्म का पालन करने के लिए राजा हरिश्चंद्र ने पहले अपनी पत्नी और पुत्र को बेच दिया, लेकिन फिर भी दक्षिणा पूरी नहीं हो सकी। अंत में उन्होंने स्वयं को भी एक चांडाल को बेच दिया, जो श्मशान भूमि का कार्य संभालता था। वहां राजा हरिश्चंद्र को अंतिम संस्कार के बदले कर वसूलने का काम दिया गया।
समय बीतता गया और एक दिन अजा एकादशी का पवित्र व्रत आया। उसी रात एक निर्धन स्त्री अपने मृत पुत्र का शरीर लेकर श्मशान पहुंची। धर्म के नियमों का पालन करते हुए राजा हरिश्चंद्र ने उससे भी कर मांगा। वह स्त्री कोई और नहीं बल्कि उनकी पत्नी थीं, लेकिन कर्तव्य के सामने राजा अपने भावनाओं से विचलित नहीं हुए। जब उनकी पत्नी के पास देने के लिए कुछ नहीं बचा, तो उन्होंने अपनी साड़ी का एक हिस्सा फाड़कर कर के रूप में अर्पित कर दिया।
राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा, त्याग और धर्म के प्रति समर्पण को देखकर भगवान प्रसन्न हो गए। उसी क्षण देवताओं ने प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद दिया। उनका पुत्र पुनः जीवित हो उठा और ऋषि विश्वामित्र ने भी उनका राज्य वापस लौटा दिया। धार्मिक मान्यता है कि अजा एकादशी व्रत के प्रभाव और सत्य के मार्ग पर अडिग रहने के कारण ही राजा हरिश्चंद्र को अपने सभी दुखों से मुक्ति मिली।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, अजा एकादशी पर दान करना बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन:
करने से पुण्य फल प्राप्त होने की मान्यता है।
भगवान विष्णु को पालनकर्ता माना गया है। अजा एकादशी के दिन उनकी पूजा करने से जीवन में संतुलन, धैर्य और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ने की मान्यता है।
भक्त इस दिन विशेष रूप से विष्णु मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
अजा एकादशी 2026 का व्रत 7 सितंबर 2026, सोमवार को रखा जाएगा।
एकादशी तिथि 6 सितंबर 2026 रात 09:59 बजे से शुरू होकर 7 सितंबर 2026 शाम 07:33 बजे तक रहेगी।
यह व्रत भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने और मानसिक शांति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
भगवान विष्णु की पूजा, तुलसी अर्पण, मंत्र जाप और व्रत रखने की परंपरा है।
यह कथा राजा हरिश्चंद्र से जुड़ी मानी जाती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत मानसिक शांति, सकारात्मकता और सुख-समृद्धि प्रदान करता है।
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