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गुप्त धाम की रहस्यमयी कहानी

गुप्त धाम

भारत एक ऐसा देश है जहाँ की संस्कृति और सभ्यता सबसे अलग है। इस खुशहाल राष्ट्र में अनगिनत दर्शनिय स्थल है तो बहुत सारे मंदिर और मस्जिद है। इन सबके अलावा कुछ ऐसे भी स्थल है जो काफी रहस्यमयी और डरावने होते है। इसी में एक है छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित गुप्त धाम। तो आइये आज हम इस धाम के बारे में विस्तार से पूरी कहानी जानेंगे और यह भी जानने का प्रयास करेंगे कि आखिर इस जगह का नाम गुप्त धाम क्यों पड़ा है।

कुछ ऐसी है गुप्त धाम की रहस्यमयी कहानी

सबसे पहले तो आपको बता दें कि यह गुप्त धाम मध्य भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के जांजगीर-चांपा जिले में स्थित है और यह शिवरीनारायण क्षेत्र में पड़ता है। इसी कारण इसे शिवनारायण गुप्त धाम कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ Astrology in Hindi के अनुसार भी इस पवित्र स्थान का विशेष महत्व बताया गया है, क्योंकि यहां की आध्यात्मिक ऊर्जा और शिव कृपा व्यक्ति के जीवन में ग्रह दोषों को शांत करने तथा सकारात्मक परिवर्तन लाने में सहायक मानी जाती है।

लेकिन आपके मन में यही बात खटक रही है कि आखिर इसे गुप्त धाम क्यों कहा जाता है और इसके पीछे क्या इतिहास रहा होगा।

दरअसल इसके पीछे कहानी यह है कि एक समय एक श्रमणा नाम की भील समुदाय से निवास करने वाली औरत हुआ करती थी। उसके पिता जो उस समय भील समुदाय के राजा थे। इसके बाद जब बेटी बड़ी हुई तो विवाह तय किया गया। लेकिन विवाह से कुछ समय पूर्व पहले सैकड़ों भैंस और बकरियों को बलि के इरादे से लाया गया। इस खून खराबे को होने से पहले ही श्रमणा ने यह तय किया कि वह विवाह से पहले ही दण्डकारण्य भाग जायेगी ताकि निर्दोष जानवरों को बचाया जा सके।

इतिहास से यह पता चलता है कि श्रमणा ऋषि-मुनियों के साथ भक्ति करना चाहती थी, लेकिन उसे नीच जाति का माना जाता था। इसी कारण वह रोज़ नदी जाने वाले रास्ते पर पड़े काँटों को हटाकर सेवा किया करती थी। Online kundli in hindi जैसी ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, ऐसी निःस्वार्थ सेवा और पुण्य कर्म व्यक्ति के जीवन में ग्रहों की बाधाओं को शांत करते हैं और भाग्य में शुभ परिवर्तन लाते हैं।

लेकिन एक दिन मतंग ऋषि उस कन्या श्रमणा को देख लेते है जब वह रास्ते में पड़े कांटे हटाती है। इसके बाद मतंग ऋषि ने श्रमणा को अपने आश्रम में ख़ुशी ख़ुशी रहने को बोल दिया। मतंग ऋषि श्रमणा को शबरी नाम से पुकारते थे। लेकिन मतंग ऋषि के अलावा बाकी ऋषि मुनि सब भील महिला श्रमणा का विरोध करने लगे लेकिन उन्होंने शबरी को नहीं निकाला और कहा कि वह ही इस आश्रम को आगे भी चलाएंगी और भगवान राम की पूजा करेजी।

जैसा कि आपने भी सुना है कि शबरी भगवान राम की एक परम भक्त थीं। वह रोज़ाना भगवान को भेंट देने के लिए बेर लाया करती थीं और यह देखने के लिए कि कहीं बेर सड़े हुए तो नहीं हैं, वे उन्हें चख लेती थीं। इसी निःस्वार्थ प्रेम और समर्पण के कारण भगवान राम ने शबरी के जूठे बेर भी प्रेमपूर्वक स्वीकार किए। जिस प्रकार कुंडली मिलान में भावनाओं, संस्कारों और आत्मिक सामंजस्य को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है, उसी प्रकार शबरी की भक्ति भी निष्कलंक भाव और सच्चे समर्पण का प्रतीक थी।

लेकिन एक दिन ऐसा आ ही गया जब भगवान राम शबरी को खोज रहे थे। जब मिले तो उनका आदर सत्कार किया और खाने में झूठे बेर खिलाए। इतना ही नहीं भगवान श्री राम ने वो जूठे बेर खा भी लिए थे।

इसके बाद राम ने शबरी का प्रेम देख यहाँ भगवान विश्वकर्मा के मंदिर का निर्माण करवाया। इस तरह यह स्थान शबरीनारायण बन गया।

कहा जाता है कि आज भी वह बेर का पेड़ मौजूद है जहाँ से शबरी ने भगवान राम को झूठे बेर खिलाए थे।

इसके अलावा यहाँ एक ऐसा चमत्कार भी सुनने को मिला था कि अगर कोई इस मंदिर में भगवान राम के पैर के पास कोई सिक्का डालता है तो लगभग 15-20 मिनट तक उसकी आवाज सुनाई पड़ती है।

लेकिन अब आप यह सोच रहे हैं कि आखिर इस स्थल को गुप्त धाम क्यों कहा जाता है, तो आपको बता दें कि भगवान राम आज भी यहाँ बेर खाने आते हैं।

गुप्त धाम का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करे


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