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तिथि केवल एक साधारण तारीख नहीं होती, बल्कि यह दिन के शुभ-अशुभ परिणामों, कार्यों में सफलता और व्यक्ति की मानसिक स्थिति के बारे में महत्वपूर्ण संकेत देती है।
वैदिक ज्योतिष के अनुसार प्रत्येक तिथि का अपना एक विशेष प्रभाव होता है, जो यह बताता है कि किस दिन किए गए कार्य सफल होंगे और किन कार्यों से बचना चाहिए।
इस लेख में आप तिथि का वास्तविक अर्थ, विभिन्न तिथियों के नाम, उनका महत्व और मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में विस्तार से जानेंगे।
किसी भी विशेष दिन की तिथि को समझना इसलिए आवश्यक होता है क्योंकि तिथि सूर्योदय से नहीं, बल्कि चंद्रमा की गति और सूर्य से उसकी दूरी के आधार पर बदलती है, और यही कारण है कि पंचांग में तिथि का विशेष स्थान माना गया है।
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ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा की एक कला को तिथि (Tithi) कहते हैं। इनकी गणना शुक्लपक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से होकर अमावस्या (30वीं तिथि) तक होती है। अमावस्या के बाद की प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक तिथियां शुक्लपक्ष की होती है। पूर्णिमा के बाद प्रतिपदा से शुरू होकर अमावस्या तक की तिथियां कृष्णपक्ष की होती हैं। यानी कि एक माह में दो पक्ष आते हैं शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष। पूर्णिमा और अमावस्या को छोड़कर बाकी तिथियों के नाम एक जैसे होते हैं।
हर एक तिथि का एक नाम है, एक ग्रह और मुहूर्त में इसका विशेष स्थान है। मुहूर्त में इसके स्थान को जानने के लिए सबसे पहले ये जानना जरूरी है कि नक्षत्र और तिथि दोनों अलग-अलग हैं। चूंकि दोनों ही एक दूसरे से जुड़े हुए हैं तो हमें दोनों को जानने की आवश्यकता है। तिथि जल तत्व है और यह हमारे मस्तिष्क-मन की स्थिति दिखाती है। नक्षत्र वायु तत्व है और यह हमारे मन द्वारा किए गए या किए जाने वाले अनुभवों के बारे में बताता है। तिथि हमारे भविष्य के सफल-असफल कार्यों की ओर इशारा करता है। इसके माध्यम से हमें इस बात का पता चलता है कि हमारे द्वारा किसी कार्य की पूर्ति होगी या नहीं। मनुष्य की Free Janam Kundli में तिथि, जल ओर शुक्र से प्रभावित रहती है। यह हमारी रुचि के बारे में बताती है। जन्म कुंडली में तिथि अति आवश्यक हिस्सा है। यह हमारे रिश्तों-संबंधों के बारे में और उनके प्रति हमारे व्यवहार के बारे में बताती है।
ज्योतिष विद्या के अनुसार तिथि, सूर्य और चंद्रमा की दूरी समेत नक्षत्र पर निर्भर करता है। अमावस्या या पूर्णिमा के बाद सूर्य से 12 डिग्री पर स्थित चंद्रमा की दूरी प्रतिपदा यानी पहली तिथि होती है। द्वितीया यानी दूसरी तिथि, भी सूर्य से 12 डिग्री पर स्थित चंद्रमा की दूरी पर निर्भर करती है जो कि 12 से 24 डिग्री हुए। सूर्योदय के साथ ही दिन प्रारंभ होता है लेकिन इससे तिथि में कोई बदलाव या समानता नहीं होती। तिथि दिन अथवा रात्रि के समय कभी भी बदल सकता है, यह हमारे सौर दिवस के अनुसार नहीं चलता है। तिथि की अवधि चंद्रमा की गति के अनुसार 19 से 26 घंटों में बदलती है।
वैवाहिक जीवन की सफलता, सामंजस्य और स्थिरता का सबसे बड़ा रहस्य है कुंडली मिलान, जो जीवनसाथी की अनुकूलता और ग्रह-योगों का सटीक आकलन करता है।
हिंदू पंचांग में कुल 15 तिथियां होती हैं, जो शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष दोनों में समान नामों से जानी जाती हैं।
1। प्रतिपदा (पड़वा)
2। द्वितीया (दूज)
3। तृतीया (तीज)
4। चतुर्थी (चौथ)
5। पंचमी (पंचमी)
6। षष्ठी (छठ)
7। सप्तमी (सातम)
8। अष्टमी (आठम)
9। नवमी (नौमी)
10। दशमी (दशम)
11। एकादशी (ग्यारस)
12। द्वादशी (बारस)
13। त्रयोदशी (तेरस)
14। चतुर्दशी (चौदस)
15। पूर्णिमा
शुक्लपक्ष की प्रतिपदा के बाद कृष्णपक्ष की पंद्रहवीं या 30वीं तिथि को अमावस्या कहते हैं।
कैलेंडर से
पंचांग से
कुंडली से
इन तिथियों को पांच संज्ञा में बांटा गया है। ये हैं - नंदा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा। इनमें भी चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी को रिक्तातिथि की संज्ञा दी गई है। ये सभी संज्ञाएं अपने नाम के अनुसार शुभ-अशुभ फल देते हैं।
| नंदा तिथि में आभूषण की खरीदारी |
व्यापार संबंधित कार्य करना शुभ फलदायी होता है। |
| भद्रा तिथि में स्वास्थ्य | शिक्षा के क्षेत्र में कार्य, किसी नए व्यवसाय की शुरुआत करना अच्छा होता है। |
| जया तिथि | प्रशासनिक विभाग, न्यायिक विभाग, विदेश यात्रा, कोर्ट-कचहरी के कार्य करना भी अच्छा होता है। |
| रिक्ता तिथि | यह तिथि दुश्मनों का विरोध करना, ऑपरेशन, कर्ज से छुटकारा पाने के लिए उत्तम होता है। |
| पूर्णा तिथि | इस तिथि लिए गए संकल्प को पूरा करने के लिए शुभ माना जाता है। |
रिक्ता तिथि एकांत, शांति और त्याग का प्रतीक है। इस तिथि में जन्में जातक, दूसरों के प्रति स्नेह भाव और समर्पण का भाव रखते हैं। ऐसे लोग समाज सेवा में अपना ज्यादातर समय बिताते हैं। किसी भी मुहूर्त का विचार करते समय रिक्ता तिथि का त्याग किया जाता है। इसमें प्रारंभ किए गए कार्य निष्फल होते हैं। हालांकि कुछ विशेष ग्रह-नक्षत्र के संयोग में इसका फल शुभ भी होता है। जैसे शनिवार को पड़ने वाली तिथि, इससे बनने वाले योग सभी दुष्प्रभावों को समाप्त कर सिद्धि प्रदान करती है।
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इसी प्रकार नंदा को शुक्रवार, भद्रा को बुधवार, जया को मंगलवार, रिक्ता को शनिवार तथा पूर्णा को गुरुवार हो तो तिथि को सिद्धा कहा जाता है। गुरुवार को पड़ने वाली तिथि कष्टकारी योग बनाती है। इसके अंतर्गत किए गए कार्य जातकों को हानि पहुंचाती है। इसी प्रकार चैत्रमास में दोनों पक्षों की रिक्ता तिथि नवमी, ज्येष्ठ मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी, कार्तिक मास में शुक्लपक्ष की चतुर्दशी, पौषमास में दोनों पक्षों की चतुर्थी, फाल्गुन मास में कृष्णपक्ष की चतुर्थी, शून्य तिथियां होती हैं। इन तिथियों में शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।