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विरुपाक्ष मंदिर की विशेषता

विरुपाक्ष मंदिर की विशेषता

भारत एक ऐसा देश है, जिसमें कई तरह की भाषाएं बोली जाती हैं। भारत के अलग-अलग राज्य में अलग भाषाएं बोली जाती हैं। इसी तरह से हर राज्य की संस्कृति भी अलग देखी जा सकती है। लेकिन इन सबके बावजूद हम सभी जानते हैं कि परमात्मा एक ही शक्ति है, हां उसके रूप ज़रूर अलग-अलग है और हर एक राज्य में उसके रूपों को भी अलग तरीके से पूजा जाता है। आज हम आपको भगवान शिव के उसी अलग अवतार बारे में बता रहे हैं। जिसे कर्नाटक राज्य में पूजा जाता है। आइए जानते हैं भगवान शिव के उस विचित्र रूप के बारे में जिनका मंदिर बड़ा ही विख्यात और पूरे भारत में प्रसिद्ध है।

 

विरुपाक्ष मंदिर स्थान

यह मंदिर बेंगलुरु से लगभग 300 किलोमीटर दूर कर्नाटक हम्पी में स्थित है। आपको बता दें यह मंदिर ऐतिहासिक स्मारकों के समूह का वों हिस्सा है जो भारत में ही नहीं बल्कि विश्व धरोहर में शामिल है। दरअसल, यह मंदिर शिव के दूसरे रूप विरुपाक्ष और उनकी पत्नी देवी पंपा का है। मंदिर के इतिहास के बारे में बताया जाता है कि विरुपाक्ष मंदिर विक्रमादित्य द्वितीय की रानी लोक महादेवी ने बनवाया था। जिसका पीछे कारण था कि रानी लोक महादेवी ने राजा विक्रमादित्य के लिए एक मन्नत मांगी थी। जो पल्लव के राजा पर विजय पाने के पश्चात पूरी हुई और रानी ने धन्यवाद के रूप में भगवान शिव के विरुपाक्ष का मंदिर बनवाया।

हम्पी में यह मंदिर तीर्थ यात्राओं का वह केंद्र है जो सदियों से सबसे पवित्र माना जाता है। यह काफी मंदिर पुराना है। इसके आसपास की जगह भी खंडहरों में तब्दील हो चुकी है, लेकिन मंदिर आज भी वैसा का वैसा ही बरकरार है और अभी भी इसमें भगवान शिव के रूप की पूजा की जाती है।

 

विरुपाक्ष मंदिर - यहाँ होती हैं भगवान शिव की आराधना

मंदिर में भगवान शिव की सवारी नंदी की एक विशाल मूर्ति भी विराजित है और यह पत्थर की बनी हुई है। एक ओर आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि मंदिर में एक अर्ध शेर और एक अर्ध मनुष्य की देह में नृसिंह की 6.7 मीटर ऊंची मूर्ति भी विराजित है। विरूपाक्ष मंदिर में जाने का प्रवेश द्वार का गोपुरम हेमकुटा पहाड़ियों में रखी चट्टानों से घिरा हुआ है। साथ ही आपको बता दें कि चट्टानों का ये दृश्य आपको आश्चर्य में डाल सकता है।

 

विरुपाक्ष मंदिर में रखी शिवलिंग की कहानी

आपको बता दें कि मंदिर में एक शिवलिंग भी रखी हुई है। जिसके बारें में कहा जाता है कि रावण की अट्टु भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने आर्शीवाद के रूप एक शक्तिशाली शिवलिंग दी और कहा कि इस शिवलिंग को तुम जहां भी रख दोगें ये वहीं पर विस्थापित हो जाएगी। इसलिए रास्तें में इसे नीचें मत रखना। रावण शिवलिंग को लेकर चल दिया, लेकिन रावण को रास्तें में रूकना पड़ा जिस कारण उसने शिवलिंग को एक बुर्जुग को सौपतें हुए कहा कि मैं आता हूं, आप इसे नीचें मत रखना। मगर दुर्भाग्यवश वो बुर्जुग शिवलिंग को ज्यादा देर तक नहीं संभाल सकें और शिवलिंग को नीचे ही रख दिया। फिर क्या था शिव के कहें अनुसार रावण शिवलिंग को वापस नहीं उठा सका। यहीं वो जगह है जहां बुर्जुग ने शिवलिंग को रखा था। आज तक भी कोई इस शिवलिंग को हिला नहीं सकता है। बस लगातार भगवान की कृपा पाने के लिए शिवलिंग के दर्शन करने के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है।

 

 


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